सिस्टम से पस्त "राष्ट्रपति दत्तक पुत्र" बुजुर्ग दंपत्ति : हुए नतमस्तक "सुशासन तिहार" के झंडाबरदारों के दरबार में सुनाई अपनी व्यथा..…

गरियाबंद(छत्तीसगढ़) । गरियाबंद जिले के बरही गांव के रहने वाले ये बुजुर्ग दंपत्ति कमार जनजाति से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है। विडंबना देखिए कि जिन्हें विशेष संरक्षण मिलना चाहिए, वे आज एक अदद छत के लिए सिस्टम के सामने दंडवत होने को मजबूर हैं। पिछले कई सालों से प्रधानमंत्री आवास योजना की आस लगाए यह परिवार दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुका था। जब माडागांव शिविर में जिला पंचायत सीईओ पहुंचे, तो बुजुर्ग दंपत्ति ने अपनी व्यथा सुनाने के लिए उनके पैरों पर गिरकर गुहार लगाई। एक तरफ सरकार सुशासन तिहार मनाकर अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विशेष पिछड़ी जनजाति के लोगों को अपने हक के लिए इस तरह गिड़गिड़ाना पड़ रहा है। सवाल यह उठता है कि जो समाज मुख्यधारा से कटा हुआ है, क्या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं कि वह खुद उन तक पहुँचकर उनकी समस्याओं का समाधान करे? फिलहाल, यह वीडियो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ गया है। अब देखना यह होगा कि आश्वासन की फाइलें कब तक हकीकत का रूप लेती हैं और इन 'दत्तक पुत्रों' को कब नसीब होती है अपने घर की छत।
सर्वे सूची से गायब है नाम प्रशासन का तर्क@@@@
इस झकझोर देने वाली घटना पर जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर का बयान भी सामने आया है। उन्होंने स्वीकार किया कि बुजुर्गों ने आवास के लिए मिन्नतें की हैं, लेकिन तकनीकी पेंच के कारण उन्हें लाभ नहीं मिल पा रहा है। सीईओ के अनुसार दंपत्ति का नाम वर्तमान की किसी भी सरकारी सर्वे सूची में शामिल नहीं है। बताया जा रहा है कि यह दंपत्ति साल 2009 से गांव से बाहर रह रहे थे, जिसके कारण इनका नाम लिस्ट में दर्ज नहीं हो सका। फिलहाल इनका राशन कार्ड बनवाया गया है प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि अगले सर्वे में इनका नाम प्राथमिकता से जोड़कर आवास दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
विज्ञापन