अघोषित आपातकाल से लोकतंत्र खतरे में, कहाँ छुपे है तथाकथित लोकतंत्र : सनानी~ क्या इनका लोकतंत्र प्रेम सिर्फ पेंशन लेने तक सीमित ~`~~
अघोषित आपातकाल में लोकतंत्र खतरे में,तो तथाकथित लोकतंत्र सेनानी कहां छुपे हैं?
क्या इनका लोकतंत्र प्रेम सिर्फ पेंशन लेने तक सीमित-
फिंगेश्वर(छत्तीसगढ़) देवेन्द्र साहू13 अक्टूबर 2026। ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष रूपेश साहू ने कहा देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात है लोकतंत्र को कुचला जा रहा है संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है और जनता के वोट की ताकत पर सवाल उठ रहे हैं, भाजपा शासित राज्यों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन रोकने के लिए बैरिकेटिंग सड़कों पर किले लगाने यातायात बाधित करने और इंटरनेट बंद करने जैसी कार्रवाई की शिकायतें सामने आ रही है। मीडिया की स्वतंत्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर भी हमला हो रहा है। ऐसे समय में लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वाले तथाकथित लोकतंत्र सेनानी आखिर कहां गायब है? क्या उनका लोकतंत्र प्रेम सिर्फ पेंशन लेने की तारीख तक ही जगाता है? साहू ने कहा कि जब युवा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते है। बेटियां न्याय मांगती है,और नागरिक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते है, तब उन्हें रोकने गिरफ्तार करने और मुकदमों में उलझाने की शिकायतें सामने आती है, लेकिन लोकतंत्र की दुहाई देने वाले तथाकथित सेनानी इन मुद्दों पर मौन साधे हुए है? वो लोग लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरे के खिलाफ आवाज उठाने से क्यों डर रहे हैं? लोकतंत्र सेनानियों में से अनेकों की राजनीतिक निष्ठा लोकतांत्रिक मूल्यों से अधिक संघ और भाजपा के विचारधारा के प्रति रही है।आज उनकी चुप्पी इस सवाल को और गंभीर बनाती है कि क्या उनका लोकतंत्र प्रेम सिद्धांतों पर आधारित है या राजनीतिक सुविधा पर जनता के टैक्स से मिलने वाली पेंशन किसी को अपने लोकतांत्रिक दायित्व से मुक्त करती। लोकतंत्र कोई तमग़ा नहीं, जिम्मेदारी है,और इस जिम्मेदारी की असली परीक्षा सत्ता के खिलाफ उठने वाली जन आवाज के समय होती है। बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान प्रत्येक नागरिक को सामान्य स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार देता है संवैधानिक संस्थाओं के निष्पक्षता मीडिया की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को भाजपा सरकार रोक रही है लोकतंत्र की परीक्षा के इस दौर में जनता को पेंशन लेने वाले तमगेधारी नहीं, संविधान और नागरिक अधिकारों के पक्ष में खड़े होने वाले लोग चाहिए तथा कथित लोकतंत्र सेनानियों को बताना चाहिए कि जब लोकतंत्र खतरे में है, तब वह जनता के साथ खड़े है, या सत्ता की सुविधा के साथ जनता सब देख रही है, लोकतंत्र की रक्षा के सवाल पर कौन बोल रहा है,और कौन खामोशी ओढ़े बैठा है।
विज्ञापन