भाद्रपद श्राद्ध पूर्णिमा पर डॉक्टर मतावले गुरुजी ने साधकों के साथ : की अध्यात्मिक साधना ~ अमरकंटक की धरा में लिया साधना और जनकल्याण का संकल्प...
Deekay Thakur
Wed, Sep 30, 2026
अमरकंटक की पावन धरती पर साधना और जनकल्याण का संकल्प
भाद्रपद श्राद्ध पूर्णिमा से तीन दिवसीय प्रवास में पूज्य गुरुदेव डॉ. आनंद मतावले जी ने साधकों के साथ की आध्यात्मिक साधना
अमरकंटक। सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में अमरकंटक केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि साधना, तपस्या, आत्मचिंतन और लोककल्याण की पवित्र भूमि के रूप में श्रद्धा का केंद्र रहा है। मां नर्मदा के उद्गम की इस दिव्य धरती पर भाद्रपद श्राद्ध पूर्णिमा के अवसर पर पूज्य गुरुदेव डॉ. आनंद मतावले जी का अपने साधकों के साथ तीन दिवसीय आध्यात्मिक प्रवास हुआ। इस दौरान साधकों ने नर्मदा उद्गम क्षेत्र एवं विभिन्न पौराणिक स्थलों के दर्शन कर साधना, प्रार्थना और जनकल्याण का संकल्प लिया। अमरकंटक को प्राचीन काल से ही तीर्थराज के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। मैकल पर्वत की गोद से मां नर्मदा का उद्गम इस भूमि को विशेष आध्यात्मिक पहचान प्रदान करता है। नर्मदा को सनातन परंपरा में रेवा और मेकलसुता के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा महात्म्य में मां नर्मदा के दर्शन की महिमा का विशेष वर्णन मिलता है और उनकी धारा को जीवन, पवित्रता तथा आत्मशुद्धि का प्रतीक माना गया है।

तीन दिवसीय प्रवास के दौरान पूज्य गुरुदेव डॉ. आनंद मतावले जी ने साधकों के साथ नर्मदा उद्गम, माई की बगिया, प्राचीन पातालेश्वर महादेव मंदिर, जलेश्वर महादेव, कपिलधारा, दूधधारा एवं कबीर चबूतरा सहित विभिन्न आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक स्थलों का दर्शन किया। घने वन, पर्वतीय वातावरण, कल-कल बहती नर्मदा की धारा और जलप्रपातों का मनोहारी दृश्य साधकों के लिए आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम बना। अमरकंटक की धार्मिक महत्ता केवल नर्मदा उद्गम तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र सोन और जोहिला जैसी नदियों के उद्गम क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। पुराणों और स्थानीय धार्मिक परंपराओं में इस क्षेत्र को ऋषि-मुनियों की तपोभूमि बताया गया है। महर्षि भृगु, ऋषि मार्कंडेय तथा संत कबीर से जुड़ी साधना-परंपराएं आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।प्रवास के दौरान पूज्य गुरुदेव ने साधकों को बाहरी तीर्थयात्रा के साथ अंतरात्मा की यात्रा के महत्व का संदेश। उन्होंने कहा कि तीर्थ का वास्तविक उद्देश्य मन की शुद्धि, सेवा-भाव, संयम और मानवता के प्रति करुणा को जागृत करना है। मां नर्मदा के पावन तट पर साधना करते हुए साधकों ने व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ समाज, राष्ट्र और समस्त मानवता के सुख-शांति एवं कल्याण के लिए प्रार्थना की। श्राद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए साधकों ने सनातन परंपरा में वर्णित श्रद्धा, तर्पण, स्मरण और सेवा के भाव को आत्मसात किया। इस अवसर पर यह संकल्प भी लिया गया कि आध्यात्मिक साधना को केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित न रखते हुए उसे समाजसेवा और जनकल्याण से जोड़ा जाएगा।इस आध्यात्मिक प्रवास में रामचंद्र वर्मा, सेजबहार; दीपक आन्डे, राजिम; नरोत्तम साहू, राजिम; अमर कश्यप, रायपुर; गिरधारी धीवर सहित अनेक साधक उपस्थित रहे। सभी ने पूज्य गुरुदेव का सानिध्य प्राप्त कर साधना, ध्यान एवं प्रार्थना में सहभागिता की।दो दिनों के प्रवास में प्राप्त गुरुदेव के सानिध्य और तीन दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा ने साधकों को आत्मचिंतन, श्रद्धा और सेवा की नई ऊर्जा प्रदान की। नर्मदा तट पर गूंजता “ॐ नर्मदे हर... हर...” का जयघोष वातावरण को भक्तिमय बनाता रहा।अमरकंटक की शांत वादियों में साधकों का यह प्रवास केवल एक तीर्थदर्शन नहीं, बल्कि आस्था से आत्मचिंतन, साधना से सेवा और व्यक्तिगत कल्याण से सर्वजन कल्याण की ओर बढ़ने वाली आध्यात्मिक यात्रा के रूप में स्मरणीय रहा। मां नर्मदा के पावन तट पर की गई जनकल्याण की प्रार्थना के साथ साधकों ने यह भाव दोहराया कि—“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”

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